प्रशांत पंड्या का फिला जगत

डाक टिकट संग्रह के सर्व प्रथम हिन्दी ब्लॉग में आपका स्वागत है | इस माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय भाषा में डाक टिकट संग्रह के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने का यह एक प्रयास है |

सुंदर और उपयोगी वस्तुओं का संग्रह मानवका स्वभाव है। हर चीज को संग्रह करने में मज़ा है और हर एक चीज के संग्रह के साथ कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त होता है लेकिन डाक टिकटों के संग्रह का मज़ा कुछ और ही है। हर डाक टिकट किसी न किसी विषय की जानकारी देता है, उसके पीछे कोई न कोई जानकारी ज़रूर छुपी होती है। अगर हम इस छुपी हुई कहानी को खोज सकें तो यह हमारी सामने ज्ञान की रहस्यमय दुनिया का नया पन्ना खोल देता है। इसीलिए तो डाक टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौक में से एक है। डाक-टिकटों का संग्रह हमें स्वाभाविक रूप से सीखने कोप्रेरित करता है इसलिए इसे प्राकृतिक शिक्षा-उपकरण कहा जाता है। इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान हमें मनोरंजन केमाध्यम से मिलता है इसलिए इन्हें शिक्षा का मनोरंजक साधन भी माना गया है। डाक-टिकट किसी भी देश कीविरासत की चित्रमय कहानी हैं। डाक टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है, जिसके द्वारा हम अनेक देशों केइतिहास, भूगोल, संस्कृति, ऐतिहासिक घटनाएँ, भाषाएँ, मुद्राएँ, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवन शैली एवं देश के महानुभावों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते है।


डाक-टिकट का इतिहास करीब १६९ साल पुराना है। विश्व का पहला डाकटिकट १ मई १८४० को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था जिसके ऊपर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था। एक पेनी मूल्य के इस टिकट के किनारे सीधे थे यानी टिकटों को अलग करने के लिए जो छोटे छोटे छेद बनाए जाते हैं वे प्राचीन डाक टिकटों में नहीं थे। इस समय तक उनमें लिफ़ाफ़े पर चिपकाने के लिए गोंद भी नहीं लगा होता था। इसके उपयोग का प्रारंभ ६ मई १८४० से हुआ। टिकट संग्रह करने में रुचि रखने वालों के लिए इस टिकट का बहुत महत्व है, क्योंकि इस टिकट सेही डाक-टिकट संग्रह का इतिहास भी शुरू होता है ।

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भारत में पहला डाक टिकट १ जुलाई १८५२ में सिंध प्रांत में जारी किया गया जो केवल सिंध प्रांत में उपयोग के लिए सिमित था । आधे आने मूल्य के इस टिकट को भूरे कागज़ पर लाख की लाल सील चिपका कर जारी किया गया था । यह टिकट बहुत सफल नहीं रहा क्योंकि लाख टूट कर झड़ जाने के कारण इसको संभाल कर रखना संभव नहीं था । फिर भी ऐसा अनुमान किया जाता है कि इस टिकट की लगभग १०० प्रतियाँ विभिन्न संग्रहकर्ताओं के पास सुरक्षीत है । डाक टिकटों के इतिहास में इस टिकट को सिंध डाक (Scinde Dawk) के नाम से जाना जाता है । बाद में सफ़ेद और नीले रंग के इसी प्रकार के दो टिकट वोव कागज (Wove Paper) पर जारी किए गए लेकिन इनका प्रयोग बहुत कम दिनों रहा क्योंकि ३० सितंबर १८५४ को सिंध प्रांत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार होने के बाद इन्हें बंद कर दिया गया । ये एशिया के पहले डाक टिकट तो थे ही, विश्व के पहले गोलाकार टिकट भी थे । संग्रहकर्ता इस प्रकार के टिकटों को महत्वपूर्ण समझते हैं और आधे आने मूल्य के इन टिकटों को आज सबसे बहुमूल्य टिकटों में गिनते हैं ।


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बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारत के सबसे पहले डाक टिकट आधा आना, एक आना, दो आना और चार आना के चार मूल्यों में अक्टूबर १८५४ में जारी किये गए । यह डाक टिकटों को लिथोग्राफी पद्धति द्वारा मुद्रित किया गया । नीचे दिखायी गयी तस्वीर लिथोग्राफ मशीन की है ।


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समय के साथ जैसे जैसे टिकटों का प्रचलन बढ़ा, १८६० से १८८० के बीच बच्चों और किशोरों में टिकट संग्रह काशौक पनप ने लगा । दूसरी ओर अनेक वयस्क लोगों ने इनके प्रति गंभीर दृष्टिकोण अपनाया । टिकटों को जमाकरना शुरू किया, उन्हें संरक्षित किया, उनके रेकार्ड रखे और उन पर शोध आलेख प्रकाशित किए । जल्दी ही इनसंरक्षित टिकटों का मूल्य बढ़ गया क्योंकि इनमें से कुछ तो ऐतिहासिक विरासत बन गए थे । ये अनुपलब्ध हुएऔर बहुमूल्य बन गए । ग्रेट ब्रिटेन के बाद अन्य कई देशो द्वारा डाक टिकट जारी किये गए ।


germanpostagestampday १९२० तक यह टिकट संग्रह का शौक आम जनता तक पहुँचने लगा । उनको अनुपलब्ध तथा बहुमूल्य टिकटों की जानकारी होने लगी और लोग टिकट संभालकर रखने लगे । नया टिकट जारी होता तो लोग डाकघर पर उसे खरीदने के लिए भीड़ लगाते । लगभग ५० वर्षों तक इस शौक का ऐसा नशा जारी रहा कि उस समय का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने जीवन में किसी न किसी समय यह शौक न अपनाया हो । इसी समय टिकट संग्रह के शौक पर आधारित टिकट भी जारी किए गए । ऊपर जर्मनी के टिकट में टिकटों के शौकीन एक व्यक्ति को टिकट पर अंकित बारीक अक्षर आवर्धक लेंस (मैग्नीफाइंग ग्लास) की सहायता से पढ़ते हुए दिखाया गया है । आवर्धक लेंस टिकट संग्रहकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण उपकरण है । यही कारण है कि अनेक डाक टिकटों के संग्रह से संबंधित डाक टिकटों में इसे दिखाया जाता है । नीचे दिखाये गये हरे रंग के ८ सेंट के टिकट को अमेरिका के डाक टिकटों की १२५वीं वर्षगाँठ के अवसर पर १९७२ में जारी किया गया था ।

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ऊपर एक रुपये मूल्य का भारतीय टिकट, यूएस ८ सेंट का टिकट तथा बांग्लादेश के लाल रंग के तिकोने टिकटों का एक जोड़ा टिकट संग्रह के शौक पर आधारित महत्वपूर्ण टिकटों में से हैं । ऊपर प्रदर्शित १ रुपये मूल्य के डाक टिकट को १९७० में भारत की राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी के अवसर पर जारी किया गया था । इसी प्रकार बांग्लादेश के तिकोने टिकटों का जोड़ा १९८४ में पहली बांग्लादेश डाक टिकट प्रदर्शनी के अवसर पर जारी किया गया था । कभी कभी डाक टिकटों के साथ कुछ मनोरंजक बातें भी जुड़ी होती हैं । उदाहरण के लिए ऊपर के दो टिकटों में से पहले यू एस के टिकट में यू एस का ही एक और टिकट तथा भारत के टिकट में भारत का ही एक और टिकट प्रदर्शित किया गया है । जब की नीचे की ओर यू एस के टिकट में दिखाए गए दोनों टिकट स्वीडन के है । इस प्रकार के मनोरंजक तथ्य डाक टिकटों के संग्रह को और भी मनोरंजक बनाते हैं

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१९४० - ५० तक डाक टिकटों के शौक ने देश विदेश के लोगों को मिलाना शुरू कर दियाथा । डाक टिकट इकट्ठा करने के लिए लोग पत्र मित्र बनाते थे, अपने देश के डाकटिकटों को दुसरे देश के मित्र को भेजते थे और दुसरे देश के डाक टिकट मंगवाना पसंद करते थे । पत्र मित्रता के इस शौक से डाक टिकटों का आदान प्रदान तो होता ही था लोग विभिन्न देशोंक के विषय में ऐसी अनेक बातें भी जानते थे जो किताबों में नहीं लिखी होती है । उस समय टीवी और आवागमन केसाधन आम न होने के कारण देश विदेश की जानकारी का ये बहुत ही रोचक साधन बने । पत्र पत्रिकाओं में टिकट से संबंधित स्तंभ होते थे और इनके विषय में बहुतसी जानकारियों को जन सामान्य तक पहुँचाया जाता था । पत्र मित्रों केपतों की लंबी सूचियाँ भी उस समय की पत्रिकाओं में प्रकाशित की जाती थी ।

धीरे धीरे डाक टिकटों के संग्रह की विभिन्न शैलीयों का भी जन्म हुआ लोग इसे अपनी जीवन शैली, परिस्थितियों और रुचि के अनुसार अनुकूलित करने लगे इस परंपरा के अनुसार कुछ लोग एक देश या महाद्वीप के डाक टिकट संग्रह करने लगे तो कुछ एक विषय से संबंधित डाक टिकट आज अनेक लोग इस प्रकार की शैलीयों का अनुकरण करते हुए और अपनी अपनी पसंद के किसी विशेष विषय के डाक टिकटों का संग्रह करके आनंद उठाते है विषयों से संबंधित डाक टिकटों के संग्रह में अधिकांश लोग पशु, पक्षी, फल, फूल, तितलियां, खेलकूद, महात्मा गाँधी, महानुभवों, पुल, इमारतें आदि विषयों और दुनिया भर की घटनाओं के रंगीन और सुंदर चित्रों से सजे डाक टिकटों को एकत्रित करना पसंद करते है

विषय में गहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए उस विषय के डाक टिकटों का संग्रह करना एक रोचक अनुभव हो सकता है । डाक टिकट संग्रह के शौक के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हर उम्र के लोगों को मनोरंजन प्रदान करता है । बचपन में ज्ञान एवं मनोरंजन, वयस्कों में आनंद और तनाव मुक्ति तथा बड़ी उम्र में दिमाग को सक्रियता प्रदान करने वाला इससे रोचक कोई शौक नही । इस तरह सभी पीढ़ियों के लिये डाक टिकटों का संग्रह एक प्रेरक और लाभप्रद अभिरुचि है । दोस्तों, क्यों न आप भी डाक टिकट के संग्रह के इस अनोखे शौक की शुरूआत करें जो आपको हर उम्र में क्रियाशील और गतिशील रखे ।

क्या आप जानते हैं कि निजी फोटो
प्रकाशित करवा कर अपने व्यक्तिगत या निजी डाक टिकट (Personalized Postage Stamps) बनवाये जा सकते हैं ? हालाँकि यह सुविधा हर देश में नहीं है पर फिलहाल ऑस्ट्रिया (Austria), आलैंड द्वीप (Aland), ऑस्ट्रेलिया (Australia), कनाडा (Canada), फ्रांस (France), जर्मनी (Germany), मलेशिया (Malaysia), माल्टा (Malta), हॉलैंड (Netherlands), न्यूज़ीलैंड (New Zealand), सिंगापुर (Singapore), इंग्लैंड (UK), यूक्रेन (Ukaraine) अमेरिका (USA) जैसे देशों में व्यक्तिगत या निजी डाक टिकट बनवाए जा सकते हैं। अमेरिका में स्टेंप्स.कोम और जैजल.कॉम द्वारा इस प्रकार के डाक टिकट उपलब्ध कराए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी व्यक्तिगत डाक टिकट उपलब्ध करवाए है ।



पिछले साल दैनिकों में हॉलैंड या नीदरलैंड सरकार द्वारा लोकप्रिय भोजपुरी गायक और अभिनेता मनोज तिवारी कोसम्मानित करने के लिए एक डाक टिकट (Postage Stamp) जारी किये जाने के समाचार प्रकाशित हुए थे लेकिनवे डाकटिकट व्यक्तिगत या निजी डाक टिकट ही थे। कुछ समय पहले इसी प्रकार के समाचार इंटरनेट के माध्यम सेपढने को मिले जिसमें बताया गया था की टी ऐन टी पोस्ट (TNT Post) हॉलैंड (Netherlands) के डाक विभागद्वारा आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के सम्मान में चार डाक टिकट जारी किए गए लेकीन वे भी व्यक्तिगत डाक टिकट ही थे ।

वर्तमान युग में पत्र लेखन की आदत बिलकुल ही कम होने की वजह से कई देशों के डाक विभाग द्वारा विशेष रूप से डाक सेवा को लोकप्रिय बनाने के लिए यह तरीका अपनाया जा रहा है । व्यक्तिगत या निजी टिकट सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया (Australia) पोस्ट द्वारा 1999 में प्रस्तुत किए गए थे उसके बाद दुनिया के कई देशों के डाक विभाग द्वारा व्यक्तिगत डाक टिकट जारी किए जा रहे हैं । व्यक्तिगत या निजी डाक टिकट ऐसे डाक टिकट है जो कोई भी व्यक्ति निजी अभिव्यक्ति के लिये किसी भी प्रकार की तस्वीर के साथ ऑर्डर (Order) देकर उसकी क़ीमत चुका कर बनवा सकता है । व्यक्तिगत रूप से डाकघर पर जाकर तस्वीर निकलवा कर या इंटरनेट के माध्यम से अपने पसंद की तस्वीर ऑनलाइन अप लोड कर के ऑर्डर (Order) दिया जा सकता है । निजी टिकट जोड़ियाँ डाक टिकटों (Setenant Stamps) की तरह दो भागों से बनी होती हैं । एक हिस्से के डाक टिकट में मूल्य, देश आदि के नाम शामिल होते है और अन्य आधा हिस्सा जोसुरक्षा प्रिंटर द्वारा रिक्त छोड़ दिया जाता है उसमें खरीदार द्वारा वांछित रूप की तस्वीर एवं उसका विवरण होता है। बाद में ये दोनों मिलकर एक डाक टिकट का रूप ले लेते है।


सिंगापुर में इसी प्रकार से बनवाए गए मेरे दो मित्रों के व्यक्तिगत या निजी डाक टिकट यहाँ हैं। उपर अहमदाबाद के कौशल पारीख के चित्र पर आधारित डाक टिकटें है जो उन्होंने सिंगापुर यात्रा के दौरान बनवाये थे । इसके निचेकौशल पारिख के निजी डाक टिकटों वाला पंजिकृत लिफाफा (Registered Envelope) है जो सिंगापुर से कौशल पारिख द्वारा हमारे फ़िलाटेलिस्ट मित्र श्रीकांत पारिख को भेजा गया है । मेरे एक अन्य फ़िलाटेलिस्ट मित्र वराद ढाकी के चित्र पर आधारित सिंगापुर के डाक टिकट भी नीचे दिखाये है।




इस प्रकार के डाक टिकट डाकखाने में चित्र खींचकर तुरंत तैयार किये जाते हैं इसलिए अक्सर इसकी छपाई में कभी कभी वह सफ़ाई नहीं दिखाई देती जो डाक विभाग द्वारा जारी किए गए डाक टिकटों में दिखाई देती है ।

भारतीय डाक विभाग द्वारा व्यक्तिगत डाक टिकटें अज्ञात समस्याओं की वजह से आधिकारिक तौर पर नही जारी किये गये हैं लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम बंगाल डाक परिमंडल (West Bengal Postal Circle) ने दिसंबर 2001 में व्यक्तिगत डाक टिकटों का एक प्रयोग किया था | 21 से 31 दिसम्बर 2001 को कोलकाता में आयोजित पंद्रहवें भारत औद्योगिक मेले (15th Industrial India Trade Fair) के दौरान भारतीय संस्करण के व्यक्तिगत डाक टिकट जारी किये गये थे । दाहिने ओर भारत का सर्वप्रथम व्यक्तिगत डाक टिकट और विशेष रद्दिकरण (Special Cancellation) दिखाये गये है। नीचे दिखाया गया लिफ़ाफा हमारी फ़िलाटेलिस्ट मित्र श्रीमती जीवन ज्योति को श्री दीपक डे द्वारा भेजा गया है जो शायद भारत का पहला लिफाफा होगा जिसके उपर व्यक्तिगत डाक टिकट का उपयोग किया गया है ।






इस भारतीय संस्करण के व्यक्तिगत डाक टिकट में कोरे १/४ आकार के कागज (¼ size blank paper sheet) को चार गुणा चार की पंक्तियों (4 x 4 row) में डाक टिकट के आकार के छिद्रण के साथ तैयार रखा गया था। खरीदार की तस्वीर एक पंक्ति में छपी जाती थी और अगली पंक्ति को खाली रखा जाता था। खाली स्थान में पंचतंत्र (Panchatantra) के विषयों पर जारी किए गए भारतीय डाक टिकट को चिपकाया जाता था। इस तरह बना था व्यक्तिगत डाक टिकटों का प्रथम भारतीय संस्करण। इस प्रयोग में जो काग़ज़ का इस्तेमाल किया गया था वह गोंद के बिना का काग़ज़ था और इसके किनारों पर बनाए गए छेद बहुत साफ़ नहीं थे। (ungummed glazed paper, with crude perforation)

कोलकाता में ही 31 जनवरी से 10 फरवरी 2002 तक आयोजित सत्ताइसवें कोलकाता पुस्तक मेले (27th Calcutta Book Fair) के समय दूसरा प्रयोग किया गया। इस बार कोलकाता सुरक्षा प्रेस, कोलकाता से गोंद वाले सुरक्षा कागज की व्यवस्था की गई थी। कोलकाता में व्यक्तिगत डाक टिकट की लोकप्रियता को देख कर, अक्तूबरमें गुजरात डाक परिमंडल ने "GPA – 2002” नामक "एक फ़्रेम डाक टिकट प्रदर्शनी" के समय व्यक्तिगत डाक टिकट जारी करने के लिए सहमति दी थी लेकिन कुछ तकनीकी समस्याओं के कारण कुछ प्रयोगों के बाद व्यक्तिगत डाक टिकट जारी नहीं किये जा सके।

व्यक्तिगत टिकटों के पहले दो प्रयोग लोकप्रिय होने की वजह से कोलकाता में 21 से 31 दिसम्बर 2002 को आयोजित सोलाहवें भारतीय औद्योगिक मेले के दौरान व्यक्तिगत डाक टिकट जारी किये गये । इसबार कोलकाता सुरक्षा प्रेस, कोलकाता के द्वारा आपूर्ति कीये गये अण्डाकार छेद वाले सुरक्षा कागज का इस्तेमाल किया गया था ।


चौथी बार कोलकाता में ही 29 जनवरी से 9 फ़रवरी 2003 कोलकाता मैदान में आयोजित अठाईसवें पुस्तक मेले के दौरान व्यक्तिगत टिकट जारी किए गए थे। इस प्रकार भारत में चार बार प्रयोगात्मक रूप से व्यक्तिगत टिकट जारी किए गए हैं । ऊपर भारत के चौथे निजी डाक टिकट पर हमारे फ़िलाटेलिस्ट मित्र श्री अशोककुमार बायेंवाला कि तसवीर दिखाई गयी है ।


शायद आने वाले दिनों में भारतीय डाक विभाग द्वारा आधिकारिक तौर पर हर एक डाक घर में व्यक्तिगत डाक टिकटों की सुविधा उपलब्ध कराई जायेगी और हम डाक घर में जा कर अपनी स्वयं की तस्वीर खिंचवाकर अपने खुद के व्यक्तिगत डाक टिकटों का ऑर्डर दे पाएँगे।

व्यक्तिगत टिकटों का उद्देश्य अपने प्रियजनों को सम्मानित करना, किसी अविस्मरणीय पल को अपने मित्रों और संबंधियों में बाँटना के लिए होता है। बहुत से लोग अपनी खुशी और शौक के लिए भी व्यक्तिगत डाक टिकट बनवाते हैं।

संदर्भ : Personalised Stamps of India, GPA News, Vol 6, Jan-Feb. 2003, (अशोककुमार बायेंवाला)

सौजन्य: श्री अशोककुमार बायेंवाला, श्री श्रीकांत परीख, श्री वराद ढाकी, श्रीमती जीवन ज्योति।




निजी टिकटों के बारे में पढ़ने के बाद मुझे विश्वास है की आप यहां दिखाये गये कार्टून में वर्णित चेहरों के निजी डाक टिकट ज़रुर देखने कि उम्मीद रखेंगे ।

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कार्टूनिस्ट: कीर्तीश भट्ट, इंदौर (दैनिक समाचारपत्र "नई दुनिया" के कार्टूनिस्ट)

महाराजा विजयसिंहजी की एप्सम डर्बी जीत के 75 वर्ष के अवसर पर राजपीपला राज्य के तत्कालीन शाही परिवार द्वारा विशेष आवरण के विमोचन समारोह का आयोजन 6 जून 2009 को विजय पैलेस, राजपीपला में किया गया । विशेष आवरण का विमोचन वड़ोदरा क्षेत्र के पोस्ट मास्टर जनरल श्री अरविंद कुमार जोशी द्वारा शाही परिवार के सदस्यों, भारतीय डाक विभाग के अधिकारी और मेहमानों की उपस्थिति में किया गया । आपका यह ब्लोगर मित्र एवं फिलेटेलिस्ट प्रशांत पंड्या भी इस् अवसर पर मौजूद था ।

विशेष आवरण (Special Cover) पर पहली तस्वीर में महाराजा विजयसिंह्जी और उनके अश्व विंडसर लेड को और दूसरी तस्वीर में डर्बी जीत के बाद महाराजा विजयसिंहजी को अपने अश्व विंडसर लेड और उनके जॉकी के साथ प्रस्थान करते हुए दर्शाया गया है । विशेष आवरण की डिजाईन अहमदाबाद के हमारे मित्र सपन ज़वेरी ने तैयार की है।

विशेष रद्दीकरण (Special Cancellation) का डिजाईन विंडसर लेड की डर्बी जीत की चित्रकारी और राजपीपला राज्य के राज्य चिह्न के ऊपर आधारित है जिसकी डिजाईन प्रशांत पंड्या ने तैयार की है।

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पहली तस्वीर में वड़ोदरा क्षेत्र के पोस्ट मास्टर जनरल श्री अरविंद कुमार जोषी विशेष (Special Cover) पर विशेष रद्दीकरण (Special Cancellation) की मुहर लगाते हुए | पोस्ट मास्टर जनरल श्री जोषी के दाहिने ओर महाराजा विजय सिंहजी के पोते श्री इंद्र विक्रम सिंहजी और बाईं तरफ फिलेटेलिस्ट श्री प्रशांत पंड्या और महाराजा विजय सिंहजी के प्रपौत्र श्री मानवेन्द्र सिंहजी |

दूसरी तस्वीर में पोस्ट मास्टर जनरल श्री जोशी मेहमानों को विशेष कवर दिखाते हुए और साथ में श्री इंद्र विक्रम सिंहजी और प्रशांत पंड्या |

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पहली तस्वीर में बड़ौदा डाक क्षेत्र के डाक सेवा निदेशक श्री एम्। संपत, महाराजा विजय सिंहजी के पोते महाराणा श्री रघुबीर सिंहजी और पोस्ट मास्टर जनरल श्री जोषी |

इस विशेष आवरण के विमोचन समारोह के दौरान राजपीपला के शाही परिवार द्वारा फिलेटेलिस्ट श्री प्रशांत पंड्या को महाराजा विजय सिंहजी के विंडसर लेड के साथ की पेंटिंग की प्रस्तुति द्वारा सम्मानित किया गया |

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